कोल्हापुर के बारे में
कोल्हापुर भारत के प्राचीन शहरों में से एक है। ईसा मसीह के जन्म से भी पहले इसके रोमन साम्राज्य के साथ व्यापारिक संबंध स्थापित थे। पंचगंगा नदी के तट पर हुई खुदाई में मिले तांबे के सिक्के और पीतल की मूर्तियाँ पश्चिम देशों से प्राचीन संपर्क का प्रमाण देती हैं। यहाँ मिली ग्रीक समुद्र देव ‘पोसाइडन’ की मूर्ति विश्व की बहुमूल्य प्राचीन वस्तुओं में गिनी जाती है। दूसरी शताब्दी ईस्वी के प्रसिद्ध रोमन इतिहासकार टॉलेमी ने भी कोल्हापुर का उल्लेख व्यापार और वाणिज्य के प्रमुख केंद्र के रूप में किया है।
पंचगंगा नदी के किनारे बसा कोल्हापुर, जिसे ‘करवीर’ भी कहा जाता है, सह्याद्री पर्वतमाला से घिरा हुआ है। पौराणिक कथाओं के अनुसार यहाँ ‘कोलासुर’ नामक एक पराक्रमी असुर रहता था, जिसके नाम पर इस नगर का नाम ‘कोल्हापुर’ पड़ा। देवी महालक्ष्मी ने उसका वध किया था। एक अन्य कथा के अनुसार यह नगर आदिवासी देवी ‘कोल्ला’ के नाम पर प्रसिद्ध हुआ। ‘करवीर’ नाम का उल्लेख पुराणों में मिलता है। कहा जाता है कि एक बार महाप्रलय में यह नगर डूब गया था, तब देवी महालक्ष्मी ने ‘कर’ और ‘वीर’ (गदा) के माध्यम से इसकी रक्षा की, इसलिए इसे ‘करवीर’ कहा जाने लगा। पद्मपुराण और स्कंदपुराण में कोल्हापुर को ‘दक्षिण काशी’ कहा गया है। कुछ श्लोकों में यह वर्णन है कि यहाँ भगवान शिव जल के रूप में, भगवान विष्णु शिला के रूप में, देवी वृक्ष के रूप में और ऋषि रेत के रूप में निवास करते हैं।
चालुक्य, शिलाहार और राष्ट्रकूट जैसे महान राजवंशों ने कोल्हापुर पर शासन किया। राजसी परंपरा, कला और संस्कृति की समृद्ध विरासत से युक्त यह शहर आज एक बहुआयामी व्यक्तित्व और रंगीन पौराणिक तथा ऐतिहासिक पृष्ठभूमि वाला नगर बन चुका है।
सुंदर प्राकृतिक दृश्य, पर्वत, वन, नदियाँ, उपजाऊ भूमि और प्रचुर जलस्रोत कोल्हापुर की भौगोलिक विशेषताएँ हैं। गोवा और कर्नाटक जैसे दो राज्यों से लगभग समान दूरी पर स्थित होने के कारण उनकी संस्कृति का प्रभाव यहाँ दिखाई देता है, फिर भी यह आज तक अपनी विशिष्ट ‘मराठा’ संस्कृति को संजोए हुए है। विभिन्न राजवंशों के शासन और स्वस्थ वातावरण ने यहाँ एक अनोखी संस्कृति को जन्म दिया, जिसकी झलक आज भी अनुभव की जा सकती है और जो हर किसी को बार-बार कोल्हापुर आने के लिए प्रेरित करती है।