अंबाबाई मंदिर
कोल्हापुर की अधिष्ठात्री देवी महालक्ष्मी को यहाँ के लोगों की जननी माना जाता है। यह मंदिर 7वीं शताब्दी में निर्मित माना जाता है। मंदिर में महालक्ष्मी, महाकाली और महासरस्वती की मूर्तियाँ विराजमान हैं। वर्ष में दो बार सूर्य की किरणें लगभग 450 फीट की दूरी से सीधे देवी की प्रतिमा पर पड़ती हैं। कोल्हापुर के लोग देवी के आशीर्वाद से शांति और समृद्धि का अनुभव करते हैं।
श्री महालक्ष्मी मंदिर हिंदू धर्म के विभिन्न पुराणों में वर्णित प्रमुख शक्ति पीठों में से एक है। शक्ति पीठ वह स्थान है जो शक्ति स्वरूपा देवी से संबंधित है। स्थापत्य की दृष्टि से यह मंदिर चालुक्य साम्राज्य से संबंधित है और इसका निर्माण लगभग 700 ईस्वी के आसपास माना जाता है।
मंदिर में स्थापित महालक्ष्मी की काले पत्थर की मूर्ति लगभग तीन फीट ऊँची है। चार भुजाओं वाली मुकुटधारी देवी की प्रतिमा रत्नों से अलंकृत है और उसका वजन लगभग चालीस किलोग्राम है। मंदिर की एक दीवार पर श्री यंत्र अंकित है। देवी का वाहन सिंह उनकी प्रतिमा के पीछे स्थित है। मुकुट में भगवान विष्णु के शेषनाग की आकृति भी है। देवी के चारों हाथों में प्रतीकात्मक वस्तुएँ हैं—
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निचले दाहिने हाथ में मृहलुंग (एक प्रकार का फल),
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ऊपरी दाहिने हाथ में गदा (कौमोदकी),
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ऊपरी बाएँ हाथ में ढाल (खेटक),
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निचले बाएँ हाथ में पानपात्र (कटोरा)।
अधिकांश हिंदू देवमूर्तियाँ उत्तर या पूर्व की ओर मुख किए होती हैं, परंतु यह प्रतिमा पश्चिममुखी (पश्चिम दिशा की ओर) है। पश्चिमी दीवार में एक छोटी खिड़की है, जिससे मार्च और सितंबर की 21 तारीख के आसपास तीन दिनों तक अस्त होते सूर्य की किरणें सीधे देवी के मुख पर पड़ती हैं।
मंदिर प्रांगण में नवग्रह, सूर्य, महिषासुरमर्दिनी, विठ्ठल-रखुमाई, शिव, विष्णु, तुलजा भवानी आदि के भी छोटे मंदिर हैं। इनमें से कुछ मूर्तियाँ 11वीं शताब्दी की हैं, जबकि कुछ अपेक्षाकृत नई हैं। परिसर में मणिकर्णिका कुंड नामक जलकुंड भी है, जिसके किनारे विश्वेश्वर महादेव का मंदिर स्थित है।
पूजा व्यवस्था
प्रतिदिन पाँच प्रकार की पूजा होती हैं—
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सुबह 5 बजे काकड़ आरती द्वारा देवी को जगाया जाता है।
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सुबह 8 बजे षोडशोपचार पूजा (16 विधियों सहित) की जाती है।
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दोपहर की पूजा
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संध्या आरती
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शेजारती (रात्रि पूजा)
विशेष उत्सव
शुक्रवार और पूर्णिमा
प्रत्येक शुक्रवार और पूर्णिमा के दिन देवी की उत्सव प्रतिमा को मंदिर प्रांगण में शोभायात्रा के रूप में निकाला जाता है।
नवरात्रि महोत्सव
आश्विन माह (अक्टूबर के आसपास) में दस दिनों तक नवरात्रि उत्सव मनाया जाता है। प्रतिदिन रात 9:30 बजे देवी की प्रतिमा को अलग-अलग रूपों में फूलों और रोशनी से सजाकर मंदिर परिसर में शोभायात्रा निकाली जाती है। इन दस दिनों में देवस्थान समिति द्वारा अनेक धार्मिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। देशभर से लाखों श्रद्धालु इस उत्सव में भाग लेने आते हैं।
ललिता पंचमी
इस दिन देवी महालक्ष्मी की पालकी को त्र्यंबोली देवी मंदिर तक ले जाया जाता है।
अष्टमी
अष्टमी के दिन रजत पालकी को सिंहासन पर स्थापित कर नगर में शोभायात्रा निकाली जाती है। यह यात्रा महाद्वार रोड, गुजरी-भाऊसिंगजी रोड, भवानी मंडप, गुरु महाराज वाड़ा, बिनखांबी गणेश मंदिर आदि स्थानों से होकर पुनः मंदिर में लौटती है। मार्ग में श्रद्धालु देवी को ओटी (साड़ी का कपड़ा, नारियल, चूड़ियाँ, मिठाई और दक्षिणा) अर्पित करते हैं।
किरणोत्सव
सूर्य की किरणें जब सीधे देवी की प्रतिमा पर पड़ती हैं, उस अवसर को किरणोत्सव कहा जाता है।
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31 जनवरी और 9 नवंबर — चरणों पर किरणें पड़ती हैं।
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1 फरवरी और 10 नवंबर — वक्षस्थल पर किरणें पड़ती हैं।
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2 फरवरी और 11 नवंबर — संपूर्ण प्रतिमा पर किरणें पड़ती हैं।
रथोत्सव
अप्रैल माह में रथोत्सव मनाया जाता है। चाँदी की प्रतिमा को फूलों और रोशनी से सजाए गए रथ में विराजित कर शाम 7:30 से 9:30 बजे तक नगर में शोभायात्रा निकाली जाती है। मार्ग में सुंदर रंगोलियाँ बनाई जाती हैं और आतिशबाजी से उत्सव की शोभा बढ़ाई जाती है। बड़ी संख्या में श्रद्धालु इस पावन अवसर पर सम्मिलित होते हैं।