कोपेश्वर मंदिर
स्थान: कोल्हापुर से लगभग 60–65 किलोमीटर पूर्व, शिरोल तहसील के खिद्रापुर में, कृष्णा नदी के तट पर।
संक्षिप्त इतिहास
खिद्रापुर का प्राचीन नाम कोप्पड़ माना जाता है। कोपेश्वर का अर्थ है क्रोधित भगवान शिव। पौराणिक कथा के अनुसार, राजा दक्ष के यज्ञ में भगवान शिव का अपमान होने पर माता सती ने यज्ञ अग्नि में अपने प्राण त्याग दिए। इससे भगवान शिव अत्यंत क्रोधित हो गए और दक्ष के यज्ञ का विनाश कर दिया। स्थानीय मान्यता के अनुसार, खिद्रापुर वह स्थान है जहाँ भगवान शिव माता सती की प्रतीक्षा कर रहे थे। निकट स्थित येडूर को दक्ष यज्ञ का स्थान माना जाता है।
यह मंदिर 11वीं–12वीं शताब्दी में शिलाहार वंश के शासनकाल में निर्मित हुआ और भारतीय शिल्पकला का उत्कृष्ट उदाहरण माना जाता है। बाद में 1213 ईस्वी में यादव राजा सिंहणदेव द्वितीय ने इसका जीर्णोद्धार कराया, जिसका शिलालेख आज भी यहाँ मौजूद है।
मंदिर की विशेषताएँ
- पूरा मंदिर काले पत्थर पर अत्यंत सुंदर नक्काशी के साथ निर्मित है।
- यह मंदिर गजपीठ पर बना है, जो 92 हाथियों की उकेरी गई प्रतिमाओं पर आधारित है।
- मंदिर में पूर्व, उत्तर और दक्षिण दिशा की ओर तीन मुख्य प्रवेश द्वार हैं।
- मंदिर के सामने स्थित स्वर्ग मंडप बिना छत वाला गोलाकार मंडप है, जो इसकी सबसे अनोखी विशेषताओं में से एक है।
- मंदिर की दीवारों और स्तंभों पर रामायण, महाभारत, अष्टदिक्पाल, देवी-देवताओं तथा अप्सराओं की उत्कृष्ट मूर्तियाँ उकेरी गई हैं।
- गर्भगृह में कोपेश्वर (भगवान शिव) और धोपेश्वर (भगवान विष्णु) की प्रतिमाएँ स्थापित हैं।
- इस मंदिर की सबसे विशिष्ट विशेषता यह है कि इसके गर्भगृह के ऊपर शिखर नहीं है, जो भारतीय मंदिर वास्तुकला में अत्यंत दुर्लभ माना जाता है।