सेनापती प्रतापराव गुजर समाधी (नेसरी)
सेनापति प्रतापराव गुजर, जिनका मूल नाम कुडतोजी गुजर था, छत्रपति शिवाजी महाराज की सेना के तीसरे सरसेनापति थे। उनके अद्वितीय साहस, युद्ध कौशल और स्वराज्य के प्रति अटूट निष्ठा से प्रभावित होकर छत्रपति शिवाजी महाराज ने उन्हें "प्रतापराव" की सम्मानित उपाधि प्रदान की।
प्रतापराव गुजर ने साल्हेर के ऐतिहासिक युद्ध में मुगल सेना को पराजित कर मराठा साम्राज्य की सैन्य शक्ति का परिचय पूरे भारत को कराया। यह युद्ध मराठा इतिहास का एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जाता है।
वर्ष 1674 में छत्रपति शिवाजी महाराज के राज्याभिषेक से कुछ समय पहले आदिलशाही के सेनापति बहलोल खान ने स्वराज्य पर आक्रमण किया। नेसरी के युद्ध में प्रतापराव गुजर ने बहलोल खान को पराजित कर बंदी बना लिया, किंतु उसके वचन पर विश्वास कर उसे मुक्त कर दिया। यह समाचार मिलने पर छत्रपति शिवाजी महाराज ने प्रतापराव को कठोर शब्दों में पत्र लिखकर अपनी नाराज़गी व्यक्त की।
अपनी भूल का एहसास होने पर प्रतापराव ने बहलोल खान को पुनः पकड़ने का संकल्प लिया। नेसरी के युद्ध में उन्होंने केवल 1,200 मराठा सैनिकों के साथ बहलोल खान की लगभग 15,000 सैनिकों वाली सेना का सामना किया। अंततः उन्होंने अपने छह वीर सरदारों के साथ शत्रु पर सीधा आक्रमण किया और वीरगति को प्राप्त हुए।
प्रतापराव गुजर के बलिदान के बाद आनंदराव मोहिते और हंबीरराव मोहिते के नेतृत्व में मराठा सेना ने बहलोल खान को पराजित कर अपने सेनापति की शहादत का प्रतिशोध लिया। इसके बाद हंबीरराव मोहिते को नया सरसेनापति नियुक्त किया गया।
प्रतापराव गुजर की वीरगति का समाचार सुनकर छत्रपति शिवाजी महाराज अत्यंत दुःखी हुए। उनके सम्मान में उन्होंने अपने छोटे पुत्र राजाराम महाराज का विवाह प्रतापराव गुजर की पुत्री जानकीबाई से कराया, जो आगे चलकर मराठा साम्राज्य की महारानी बनीं।
प्रतापराव गुजर और उनके छह वीर साथियों के अद्वितीय बलिदान को महान कवि कुसुमाग्रज ने अपनी अमर कविता "वेडात मराठे वीर दौडले सात" में अमर कर दिया, जिसे बाद में भारत रत्न लता मंगेशकर ने स्वर दिया।