सामानगढ़ किला
स्थान: सह्याद्रि पर्वतमाला के निकट
आधार स्थान: गडहिंग्लज
समुद्र तल से ऊँचाई: 790 मीटर
संक्षिप्त इतिहास
सामानगढ़ किले का निर्माण शिलाहार वंश के राजा भोज द्वितीय ने करवाया था। वर्ष 1667 में छत्रपति शिवाजी महाराज ने इस किले को आदिलशाही से जीत लिया। इसके बाद वर्ष 1676 में उन्होंने किले की किलेबंदी को और अधिक मजबूत कराया तथा इसे हथियार, बारूद और रसद के भंडारण के लिए उपयोग किया। इसी कारण सामानगढ़ को "छोटा लेकिन अत्यंत मजबूत किला" कहा जाता था।
छत्रपति शिवाजी महाराज के निधन के बाद वर्ष 1688 में औरंगज़ेब ने इस किले पर कब्ज़ा कर लिया। अगस्त 1701 में यह पुनः मराठों के अधीन आ गया। बाद में औरंगज़ेब के पुत्र बेदारबख्त ने इसे फिर से जीतकर शाहमीर को किले का प्रभारी नियुक्त किया। अंततः वर्ष 1704 में मराठों ने इसे पुनः अपने अधिकार में ले लिया।
वर्ष 1844 में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध विद्रोह करने वाले प्रमुख किलों में सामानगढ़ भी शामिल था। अंततः अक्टूबर 1844 में ब्रिटिश सेना ने इस किले पर अधिकार कर इसकी किलेबंदी को काफी हद तक ध्वस्त कर दिया।
किले की विशेषताएँ
सामानगढ़ एक अंडाकार पहाड़ी के शिखर पर स्थित है। इसकी लगभग 8 फुट ऊँची प्राचीर आज भी अधिकांश स्थानों पर सुरक्षित है। पहले यहाँ चट्टानों को काटकर बनाए गए कई जलाशय थे, जो पूरे वर्ष पानी की आपूर्ति करते थे। वर्तमान में उनमें से कुछ ही शेष हैं।
किला घने वृक्षों से घिरा हुआ है और महाराष्ट्र सरकार के सामाजिक वानिकी विभाग द्वारा इसे एक पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया गया है। किले के समीप मारुति मंदिर तथा चालोबा मंदिर भी स्थित हैं। पास का नौकूड गाँव इस किले का निकटतम ग्रामीण क्षेत्र है।
दर्शनीय स्थल
- कमान बाव (चट्टान काटकर बनाया गया कुआँ)
- अंबाबाई मंदिर
- चोर दरवाजा
- राम गुफा
- शिव मंदिर गुफा
ठहरने की व्यवस्था
सामानगढ़ किले पर होटल या भोजन की सुविधा उपलब्ध नहीं है। रात्रि विश्राम के लिए गडहिंग्लज में होटल और अन्य आवास सुविधाएँ उपलब्ध हैं.