पुराना नाम: पन्नगलय (सर्पों का निवास)
स्थान: कोल्हापुर से लगभग 20 कि.मी. उत्तर-पश्चिम
समुद्र तल से ऊँचाई: 953 मीटर
संक्षिप्त इतिहास
पन्हाला किले का निर्माण शिलाहार वंश के राजा भोज द्वितीय ने 1187 ई. में कराया था। बाद में यह किला यादव वंश के राजा सिंहण के अधीन आया तथा 1489 ई. में आदिलशाही के अधिकार में चला गया।
पन्हाला किला मराठा साम्राज्य के इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। 28 नवंबर 1659 को छत्रपति शिवाजी महाराज ने इस किले पर विजय प्राप्त की और लगभग डेढ़ वर्ष तक यहाँ निवास किया।
पन्हाला से विशालगढ़ का ऐतिहासिक प्रस्थान
2 मार्च 1660 को आदिलशाही सेनापति सिद्दी जौहर ने लगभग 30,000 सैनिकों के साथ पन्हाला किले की घेराबंदी कर दी। लंबे समय तक चले इस घेराव के कारण किले में भोजन और रसद की भारी कमी हो गई।
ऐसी परिस्थिति में 13 जुलाई 1660 (आषाढ़ी पूर्णिमा की वर्षा भरी रात) को छत्रपति शिवाजी महाराज ने लगभग 600 मावलों के साथ विशालगढ़ जाने की योजना बनाई। उन्होंने आत्मसमर्पण का संदेश भेजकर शत्रु को भ्रमित किया और उसी अवसर का लाभ उठाकर किले से निकल गए।
शिवाजी महाराज के स्थान पर शिवा काशीद, जो उनके समान दिखाई देते थे, स्वयं को शिवाजी महाराज के रूप में प्रस्तुत कर शत्रु के हाथों वीरगति को प्राप्त हुए। इस महान बलिदान के कारण शिवाजी महाराज को आगे बढ़ने का समय मिला।
जब सिद्दी जौहर को वास्तविकता का पता चला तो उसने सिद्दी मसूद को पीछा करने भेजा। विशालगढ़ पहुँचने के मार्ग में घोड़खिंड नामक संकरे दर्रे पर वीर बाजी प्रभु देशपांडे ने केवल 300 मावलों के साथ शत्रु सेना को लगभग 22 घंटे तक रोककर रखा।
बाजी प्रभु ने तब तक युद्ध जारी रखा, जब तक विशालगढ़ से तोप चलने की आवाज़ नहीं आई, जो इस बात का संकेत थी कि शिवाजी महाराज सुरक्षित पहुँच चुके हैं। इसके बाद उन्होंने वीरगति प्राप्त की। उनकी वीरता की स्मृति में घोड़खिंड का नाम बदलकर पावनखिंड रखा गया।
बाद में 1661 में आदिलशाह ने किले पर पुनः अधिकार कर लिया, किंतु 6 मार्च 1673 को कोंडाजी फर्जंद और अण्णाजी पंत के नेतृत्व में मराठों ने इसे फिर से जीत लिया। 1782 तक यह मराठा राज्य की राजधानी भी रहा।
पन्हाला किला पश्चिमी घाट के प्रमुख मार्गों की सुरक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण रणनीतिक दुर्ग था।
दर्शनीय स्थल
- पुसाटी बुर्ज – जहाँ से शत्रु की गतिविधियों पर निगरानी रखी जाती थी तथा मसाई पठार का सुंदर दृश्य दिखाई देता है।
- तीन दरवाजा – किले का अत्यंत सुरक्षित और भव्य प्रवेश द्वार।
- अंबरखाना (धान्य कोठार) – तीन विशाल अनाज भंडार (गंगा, यमुना और सरस्वती) जिनमें लगभग 25,000 खंडी अनाज संग्रहित किया जा सकता था।
- वीर बाजी प्रभु देशपांडे स्मारक – स्वराज्य के लिए सर्वोच्च बलिदान देने वाले महान योद्धा की स्मृति।
- चार दरवाजा – किले का प्राचीन मुख्य प्रवेश द्वार, जिसके अब केवल अवशेष शेष हैं।
- सोमेश्वर तालाब एवं मंदिर – भगवान शिव को समर्पित प्राचीन मंदिर और सुंदर जलाशय।
- वीर शिवा काशीद स्मारक – शिवाजी महाराज की रक्षा हेतु अपने प्राणों का बलिदान देने वाले वीर शिवा काशीद की स्मृति।
- सज्जा कोठी – तीन मंजिला ऐतिहासिक इमारत, जहाँ से वारणा घाटी का मनमोहक दृश्य दिखाई देता है।
- अंधार बाव – अपनी अनूठी प्राचीन वास्तुकला के लिए प्रसिद्ध ऐतिहासिक बावड़ी।
- नायकिनीचा सज्जा (कलावंतिनी सज्जा) – प्राचीन काल में संगीत एवं नृत्य प्रस्तुतियों का स्थान।
- नागझरी – पन्हाला किले का प्राचीन जलाशय।
- तबाक उद्यान – सुंदर उद्यान तथा सर्प संग्रहालय।
ठहरने की व्यवस्था
पन्हाला में पर्यटकों के लिए अनेक होटल, रिसॉर्ट, लॉज और भोजनालय उपलब्ध हैं।
निकटवर्ती पर्यटन स्थल
- मसाई पठार – 5 कि.मी.
- ज्योतिबा मंदिर – 12 कि.मी.
- पैजारवाड़ी – 15 कि.मी.
- आंबा घाट – 50 कि.मी.
आज पन्हाला अपने ऐतिहासिक किले, प्राकृतिक सौंदर्य और सुखद जलवायु के कारण कोल्हापुर जिले के प्रमुख हिल स्टेशन एवं लोकप्रिय पर्यटन स्थलों में से एक माना जाता है।